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गांव के सीसीटीवी कैमरे होते थे बुजुर्ग

  *👉 #आलेख-गांव के सीसीटीवी कैमरे होते थे बुजुर्ग...!!* ⚫ क्या कभी सोचा कि हमारे गाँव इतने सुरक्षित कैसे रहते थे...? न थाने की गश्तें, न कै...

 *👉 #आलेख-गांव के सीसीटीवी कैमरे होते थे बुजुर्ग...!!*



⚫ क्या कभी सोचा कि हमारे गाँव इतने सुरक्षित कैसे रहते थे...? न थाने की गश्तें, न कैमरों का जाल, न मोबाइल ट्रैकिंग,न खाकी की पहरेदारी,मगर फिर भी सुकून,शांति..। यहाँ तक कि कई मर्तबा अपराधों की आहट तक गाँव के लोग पहले से जान लेते थे।सोचिएआख़िर कोन सा सिस्टम था जो इस व्यवस्था को बनाये हुये था..? कारण था गाँव के वो जीवंत प्रहरी हमारे बुजुर्ग..। वे जो चबूतरे पर बैठे रहते थे, किसी पीपल या बरगद की छाँव में, घरों के दरवाजों के सामने जमे पत्थरों पर, लाठी टिकाए हुए। उन्हें इस काम के लिये न किसी ने नियुक्त किया था और न ही उनका कोई पारश्रमिक था..!उनका काम न किसी नियुक्ति से तय था, पर वे थे गाँव की आँखें, कान और आत्मा..।


हर आने-जाने वाले पर उनकी पैनी निगाह रहती थी। कोई अनजान चेहरा गाँव में दाखिल होता, तो कुछ ही देर में उसका घर-परिवार, ठिकाना और मकसद सब उनकी जानकारी में होता। वे बिना बोले सब समझ लेते थे। किस घर की बेटी स्कूल से लौटी है, किस घर का लड़का अब तक चौपाल पर क्यों नहीं पहुँचा, किस दिशा से कोई परदेसी आया है ,कहॉ गया है, सब उनकी दृष्टि में दर्ज होता। सच पूछिए तो वे उस युग के ऐसे सीसीटीवी कैमरे थे जो न कभी बंद होते थे, न कभी भूलते थे।


उनकी मौजूदगी ही अनुशासन थी। गाँव का कोई लड़का अगर गलती कर दे, तो उसे पुलिस नहीं, उनके तेवर संभाल लेते थे। उनकी डाँट में डर नहीं, संस्कार था। वे बिना शब्दों के सिखा देते थे कि “मर्यादा” क्या होती है। और बहन-बेटियाँ...? वे उनके सामने सिर झुकाकर निकलती थीं ।यह भय नहीं, सम्मान था, संस्कार की वह रेखा थी जो उस समाज की गरिमा की रक्षा करती थी।


रात के सन्नाटे में जब पूरा गाँव नींद में डूब जाता था, तब भी उनकी खाँसी और खुर्राटों की आवाजें गाँव की पहरेदारी करती थीं। नींद कितनी भी हो लेकिन हल्की सी आहट होती, तो लकड़ी की टक-टक और एक भारी सी आवाज “कौन है रे..?” इस आवाज में वो खनक होती थी कि ऐसे-वैसे की रूह कांप जाये। उनके रहते गाँव चैन से सोता था। वे थकते नहीं थे, बस स्वतः अपनी जिम्मेदारी को ओढ़कर अपने कर्तव्य में घुले हुए थे।


और आज... कैमरे तो हैं, पर भरोसा नहीं। गली-गली में CCTV लगे हैं, लेकिन उनकी निगाहों में अपनापन नहीं है। पहले निगाहें पहचानती थीं, अब कैमरे सिर्फ रिकॉर्ड करते हैं। पहले गलती करने वाला सुधर जाता था, अब बस फुटेज देखकर मामला दर्ज होता है। फर्क बस इतना है कि तब निगरानी में संवेदना थी, अब केवल शंका..।


वे बुजुर्ग सिर्फ व्यक्ति नहीं थे बल्कि गाँव की जीवंत संस्कृति थे। उनकी डाँट में नीति थी, उनकी चुप्पी में अनुभव, और उनके अनुभव में पूरे गाँव की सुरक्षा की गारंटी। पीढियां गुजरी,शहर प्रेम उमड़ा तो आज चबूतरे खाली हैं, पेड़ मौन हैं, और दरवाजों के आगे रखे पत्थर धूल से ढँक गए हैं । लगता है जैसे बुजुर्गों की उस पीढ़ी के साथ साथ गाँव की आत्मा ने भी पहरेदारी छोड़ दी है।


वो बुजुर्ग चले गए, पर उनकी निगाहें अब भी याद आती हैं  जो बिना रिकॉर्ड किए सब कुछ देखती थीं, समझती थीं, और सँभालती थीं। उनकी मेमोरी जो कभी फुल नही होती थी ,ओर मनचाहा डाटा बिना सर्चिंग के जस का तस निकल आता था।वे सच में उस युग के जीवंत कैमरे थे  जिनकी फुटेज आज भी यादों में साफ़-साफ़ दिखती है।

सच,हम अपडेट तो हुये मगर आज भी उन दरख्तों के सामने बौने ही है..!हम कागज की डिग्री हांथो में लेकर 'पढ़-लिख' तो गये किन्तु 'गुन' नही सके..!


*✍️ बृजेश सिंह तोमर*

(वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक)

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