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बस की छत पर मौत का सफर, कुंभकर्णी नींद में परिवहन विभाग! आखिर किस हादसे का इंतजार है प्रशासन को?

 🖋️ अफसरनामा बस की छत पर मौत का सफर, कुंभकर्णी नींद में परिवहन विभाग! आखिर किस हादसे का इंतजार है प्रशासन को? विनोद विकट Editor-in-Chief शि...

 🖋️ अफसरनामा

बस की छत पर मौत का सफर, कुंभकर्णी नींद में परिवहन विभाग! आखिर किस हादसे का इंतजार है प्रशासन को?

विनोद विकट

Editor-in-Chief


शिवपुरी जिले में परिवहन व्यवस्था आखिर चल कौन रहा है? कानून, प्रशासन या फिर बस संचालकों की मनमानी? पोहरी से सामने आई यह तस्वीर केवल एक ओवरलोड बस की नहीं, बल्कि पूरे परिवहन तंत्र की विफलता की तस्वीर है।

तस्वीर में साफ दिखाई दे रहा है कि दर्जनों यात्री बस की छत पर बैठकर यात्रा कर रहे हैं। यह दृश्य किसी पिछड़े और कानूनविहीन क्षेत्र का नहीं, बल्कि उस जिले का है जहां परिवहन विभाग, पुलिस विभाग और जिला प्रशासन की पूरी मशीनरी मौजूद है। इसके बावजूद मौत को दावत देती यह बस बेखौफ सड़कों पर दौड़ रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जिला परिवहन अधिकारी रंजना कुशवाहा और उनका अमला कर क्या रहा है?

क्या परिवहन विभाग की जिम्मेदारी केवल कागजों में चालान बनाने और हादसों के बाद औपचारिक कार्रवाई तक सीमित रह गई है?

जब बस की छत पर बैठे यात्रियों को आम नागरिक देख सकते हैं, पत्रकार देख सकते हैं, राहगीर देख सकते हैं, तो फिर परिवहन विभाग को यह सब क्यों नहीं दिखाई देता?

या फिर यह मान लिया जाए कि विभाग सब कुछ देखकर भी आंखें मूंदे बैठा है?

शिवपुरी में अभी कुछ ही समय पहले इंटरसिटी बस में शॉर्ट सर्किट के कारण आग लगी थी, जिसमें एक मासूम की जान चली गई। उससे पहले गुना बस हादसे में 13 लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। गीता पब्लिक स्कूल बस में भी आग लगने की घटना सामने आई थी। इन हादसों के बाद बड़े-बड़े दावे किए गए, सुरक्षा के भाषण दिए गए, अभियान चलाने की बातें हुईं, लेकिन आज की तस्वीर उन सभी दावों की पोल खोल रही है।

प्रश्न यह भी है कि यदि यह बस पोहरी थाना क्षेत्र से होकर गुजर रही थी तो क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी की नजर इस पर नहीं पड़ी? और यदि पड़ी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

सूत्रों के अनुसार परिवहन अधिकारी रंजना कुशवाहा के पास कई जिलों का प्रभार है। लेकिन क्या अतिरिक्त प्रभार का मतलब यह है कि शिवपुरी जिले को बस संचालकों की दया पर छोड़ दिया जाए?

एक और गंभीर आरोप लगातार सामने आता रहा है कि किसी भी मामले में परिवहन अधिकारी से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया जाए तो फोन नहीं उठता, संदेशों का जवाब नहीं मिलता। आखिर जनता के टैक्स से वेतन लेने वाले अधिकारियों की जवाबदेही किसके प्रति है?

अब सवाल सीधे कलेक्टर अर्पित वर्मा से भी है।

क्या जिले में परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली की कभी समीक्षा हुई? क्या यह जांचने की कोशिश हुई कि सड़कों पर कितनी ओवरलोड बसें दौड़ रही हैं? कितनी स्कूल बसें सुरक्षा मानकों का पालन कर रही हैं? कितने वाहन बिना नियमों के यात्रियों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं?

यदि विभाग अपना काम कर रहा है तो फिर ऐसी तस्वीरें बार-बार क्यों सामने आ रही हैं?

और यदि विभाग काम नहीं कर रहा तो फिर जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जा रही?

हकीकत यह है कि शिवपुरी में अक्सर किसी बड़े हादसे के बाद परिवहन विभाग अचानक सक्रिय होता है। कुछ दिन सड़कों पर चेकिंग चलती है, फोटो खिंचते हैं, प्रेस नोट जारी होते हैं और फिर पूरा अमला गायब हो जाता है। ऐसा लगता है मानो विभाग की सक्रियता केवल हादसों की शवयात्रा तक सीमित रह गई हो।

आज बस की छत पर बैठे ये लोग सुरक्षित अपने घर पहुंच जाएं, यह सौभाग्य की बात हो सकती है। लेकिन यदि कल इनमें से कोई बिजली के तार की चपेट में आ जाए, बस पलट जाए या कोई बड़ा हादसा हो जाए, तो क्या प्रशासन यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच जाएगा कि "हादसा दुर्भाग्यपूर्ण था"?

नहीं।

ऐसी स्थिति में जिम्मेदारी सीधे उन अधिकारियों पर भी आएगी जिनके कंधों पर कानून लागू कराने की जिम्मेदारी है।

सवाल यह नहीं कि बस की छत पर लोग क्यों बैठे हैं। सवाल यह है कि प्रशासन की आंखों के सामने बैठे हैं, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक यह तस्वीर केवल एक फोटो नहीं, बल्कि शिवपुरी की परिवहन व्यवस्था पर लगा एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनी रहेगी।

— अफसरनामा

विनोद विकट

Editor-in-Chief, IndiaAajTak.in

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