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बीजेपी के नितिन नबीन...?

  मूर्खों का एक हुजूम उमड़ पड़ा है जो टिप्पणी कर रहा है कि श्री नितिन नबीन को भाजपा ने राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर एक रबर स्टाम्प बैठा...

 मूर्खों का एक हुजूम उमड़ पड़ा है जो टिप्पणी कर रहा है कि श्री नितिन नबीन को भाजपा ने राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर एक रबर स्टाम्प बैठा दिया है।


ऐसे मूर्खों को शायद यह समझ नहीं है कि “पद और कद” में से सदैव “क़द” ही बड़ा होता है। आप दुनिया के किसी व्यक्ति को उठाकर भाजपा का अध्यक्ष बना दो, जो वजूद नरेंद्र मोदी जी का है, अमित शाह जी का है, राजनाथ जी का है, उसे कोई खा नहीं जायेगा और यदि कोई आकर उस नेता और कोर टीम को खाने का प्रयास करता है जिसने अपने मेहनत से पार्टी को फिर से न केवल पुनर्जीवन प्रदान किया है बल्कि उसे अभेद्य भी बनाया है तो ऐसे व्यक्ति को बनाया ही क्यों जाएगा? 

यदि पूर्व की ही भाँति श्री नितिन नबीन को कार्यकारी से पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाता है तो यह स्पष्ट संदेश है कि पार्टी नए पीढ़ी से थर्ड लाइन नेतृत्व भी गढ़ना चाहती है। पहले से ही फर्स्ट लाइन और सेकेंड लाइन लीडरशिप पार्टी के अच्छी संख्या में है और जिस व्यक्ति की उम्र 45 वर्ष है वह अपने नीचे थर्ड लाइन के ही कार्यकर्ता को तैयार करेगा। 

पूर्व में जब पार्टी में अटल आडवाणी जी की जोड़ी थी तब पार्टी ने श्री बंगारू लक्ष्मण जी को, श्री जना कृष्णमूर्ति जी को और श्री वेंकैया नायडू जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, तो क्या ये लोग अटल आडवाणी जी के सामने समानांतर सत्ता केंद्र शुरू कर दिए थे? नहीं किए थे और करना भी नहीं चाहिए। 

यदि कुछ लोगों को यह लगता है कि श्री नितिन नबीन अपना अस्तित्व नहीं बना पाएंगे तो उन्हें यह याद रखना चाहिए कि श्री नितिन गडकरी को 2009 में जब राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था तब वह भी एक कि राज्य स्तर के नेता थे और वहाँ मंत्री रह चुके थे। कैडर आधारित पार्टी है, अब आपको मौका दिया गया है तो आप अपने पद से अपने कद का निर्माण करिए। 

राज्य और केंद्र में पार्टी का स्वरूप भिन्न भिन्न होता है। राज्य में संगठन और सरकार दोनों को मज़बूत रखा जाता है ताकि सरकार से नाराज़ व्यक्ति का संगठन सहारा बने और संगठन से नाराज़ व्यक्ति का सरकार सहारा बने लेकिन केंद्र का मतलब ही केंद्र होता है। वहाँ दो सर्किल नहीं हो सकता और यदि होता है तो वह पार्टी को तबाह करेगा। केंद्र की राजनीति वैसे भी लोकल न होकर सैद्धांतिक होती है जहाँ पर लोगों में मतभेद का सवाल ही नहीं, और यदि है तो किसी भी पार्टी के लिए संकट है। 

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