राजनीतिक तीर | विनोद विकट महिला अध्यक्षों के अधिकार पर सवाल: कोलारस में पूर्व अध्यक्ष की जनसुनवाई से गरमाई राजनीति शिवपुरी। स्थानीय निकायों ...
राजनीतिक तीर | विनोद विकट
महिला अध्यक्षों के अधिकार पर सवाल: कोलारस में पूर्व अध्यक्ष की जनसुनवाई से गरमाई राजनीति
शिवपुरी। स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण देकर उन्हें नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपने की व्यवस्था का उद्देश्य स्पष्ट है—महिलाएं संस्थाओं की कमान संभालें और अपने पद के अधिकारों के साथ निर्णय लें। लेकिन कोलारस नगर पंचायत में मंगलवार को सामने आया घटनाक्रम इस व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर रहा है।
कोलारस नगर पंचायत की वर्तमान अध्यक्ष प्रियंका हैं। इसके बावजूद पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष रविंद्र द्वारा नगर पंचायत कार्यालय में बैठकर आवेदकों की सुनवाई किए जाने की जानकारी उनके फेसबुक पेज पर साझा की गई। पोस्ट में अधिकारियों को निर्देश दिए जाने का भी उल्लेख है।
यहीं से राजनीतिक बहस शुरू होती है।
जब नगर पंचायत की अध्यक्ष वर्तमान में प्रियंका हैं तो पूर्व अध्यक्ष रविंद्र ने किस अधिकार के तहत नगर पंचायत कार्यालय में बैठकर लोगों की सुनवाई की और अधिकारियों को निर्देश दिए?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पूर्व जनप्रतिनिधि और वर्तमान निर्वाचित पदाधिकारी की भूमिकाएं अलग होती हैं। पूर्व जनप्रतिनिधि के अनुभव और राजनीतिक प्रभाव का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन किसी वर्तमान संस्था में प्रशासनिक या जनसुनवाई की भूमिका निभाने के लिए नियम और अधिकार स्पष्ट होना जरूरी है।
यदि पूर्व अध्यक्ष को किसी आदेश या अधिकृत व्यवस्था के तहत यह जिम्मेदारी दी गई थी तो संबंधित आदेश सामने आना चाहिए। यदि कोई आदेश नहीं था तो नगर पंचायत के अधिकारियों को यह बताना चाहिए कि उन्होंने पूर्व अध्यक्ष के निर्देशों को किस आधार पर स्वीकार किया।
शिवपुरी जिले में महिला नेतृत्व की तस्वीर भी इस सवाल को और महत्वपूर्ण बनाती है। शिवपुरी नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा, जिला पंचायत अध्यक्ष नेहा यादव, शिवपुरी जनपद अध्यक्ष हेमलता रावत और करैरा नगर पंचायत अध्यक्ष शारदा रावत जैसे पदों पर महिला जनप्रतिनिधि जिम्मेदारी संभाल रही हैं।
जब महिलाओं को आरक्षण के माध्यम से अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी जाती है तो उनकी भूमिका केवल औपचारिक नहीं होनी चाहिए। उन्हें संस्था चलाने के अधिकार भी स्पष्ट रूप से मिलने चाहिए।
अगर किसी महिला अध्यक्ष की संस्था में कोई पूर्व जनप्रतिनिधि बैठकर आवेदकों की सुनवाई करे और अधिकारियों को निर्देश देता नजर आए, तो जनता के बीच यह संदेश जा सकता है कि निर्वाचित अध्यक्ष के समानांतर कोई दूसरी व्यवस्था काम कर रही है। यही वह बिंदु है जिस पर जिला प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
कलेक्टर अर्पित वर्मा इस मामले में संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेकर यह स्पष्ट करा सकते हैं कि नगर पंचायत कार्यालय में हुई सुनवाई किस नियम या आदेश के तहत हुई थी। साथ ही स्थानीय निकायों में पूर्व अध्यक्षों और पूर्व जनप्रतिनिधियों की वर्तमान भूमिका की सीमा भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
विपक्षी दलों को भी इस मामले को केवल राजनीतिक बयानबाजी का विषय बनाने के बजाय नियमों की स्पष्टता का मुद्दा बनाना चाहिए। कांग्रेस, बसपा, आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों को यह पूछना चाहिए कि निर्वाचित महिला अध्यक्ष के अधिकारों के समानांतर किसी पूर्व जनप्रतिनिधि की भूमिका किस सीमा तक हो सकती है।
राजनीति में पुराने और नए जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद होना कोई असामान्य बात नहीं है। लेकिन संवाद और प्रशासनिक अधिकार दो अलग-अलग बातें हैं। जनता की सुनवाई कौन करेगा, अधिकारियों को निर्देश कौन देगा और निर्णय की जिम्मेदारी किसकी होगी—इन सवालों का जवाब पद और नियमों से तय होना चाहिए।
कोलारस का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आज सवाल एक नगर पंचायत का है, लेकिन कल यही सवाल जिले की किसी दूसरी संस्था में खड़ा हो सकता है।
महिला को अध्यक्ष बनाकर यदि अधिकारों की भूमिका कहीं और तलाशनी पड़े, तो फिर महिला आरक्षण की सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब देखना यह है कि नगर पंचायत प्रशासन और जिला प्रशासन इस पूरे घटनाक्रम पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं और क्या संबंधित नियम जनता के सामने रखे जाते हैं।
— विनोद विकट




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