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भोपाल से दो पत्रकारों की गिरफ्तारी: सत्ता की तलवार चली, कलम की नोक मुंदी… ‘चौथा स्तंभ’ अब दर्शक दीर्घा में

  भोपाल से दो पत्रकारों की गिरफ्तारी: सत्ता की तलवार चली, कलम की नोक मुंदी… ‘चौथा स्तंभ’ अब दर्शक दीर्घा में पोपटलाल विशेष भोपाल / मध्यप्रदे...

 भोपाल से दो पत्रकारों की गिरफ्तारी: सत्ता की तलवार चली, कलम की नोक मुंदी… ‘चौथा स्तंभ’ अब दर्शक दीर्घा में

पोपटलाल विशेष






भोपाल / मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में शुक्रवार को जो हुआ, वह सिर्फ दो पत्रकारों की गिरफ्तारी नहीं थी — वह लोकतंत्र की छाती पर दर्ज़ एक स्याह निशान था। वरिष्ठ पत्रकार आनंद पांडे और हरिश दिवेकर को राजस्थान पुलिस ने उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी के खिलाफ कथित झूठी खबरें प्रकाशित करने और ब्लैकमेलिंग के आरोप में हिरासत में लेकर जयपुर रवाना कर दिया।

कानून की किताब में मानहानि एक जमानती अपराध है, लेकिन यहाँ तो मामला कुछ और ही था — मानो किसी आतंकी को पकड़ा गया हो। मध्यप्रदेश की धरती पर आई राजस्थान पुलिस ने बाकायदा ‘ऑपरेशन’ चलाया और पत्रकारों को उठा ले गई। मध्यप्रदेश पुलिस? वह तो इस पूरे प्रकरण में मूक दर्शक बनी रही — जैसे लोकतंत्र के मंच पर किसी सस्ती नौटंकी का एक्स्ट्रा कलाकार।

इस कार्रवाई की कांग्रेस नेताओं और वरिष्ठ पत्रकारों ने कड़ी निंदा की है। कांग्रेस नेता अरुण यादव ने लिखा, “जब सच बोलने वाले जेल में हों और झूठ फैलाने वाले आज़ाद घूमें, तब समझिए लोकतंत्र खतरे में है। उनके संस्थान की टैगलाइन ‘हम सिर्फ भगवान से डरते हैं’ भाजपा सरकार को सबसे ज्यादा डराती है, क्योंकि सच्चा पत्रकार सत्ता से समझौता नहीं करता।”

केके मिश्रा ने इसे “लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर अशोभनीय प्रहार” बताया। उन्होंने कहा, “यह भाजपाई राजनीतिक तालिबानी संस्कारों का हिस्सा है। सत्ता का अहंकार अधिक दिन टिकता नहीं।”

वरिष्ठ पत्रकार शैलेंद्र तिवारी ने कहा, “यह अघोषित इमरजेंसी है, राजस्थान सरकार का तरीका पूरी तरह दमनकारी है।” इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष दीपक कर्दम ने साफ कहा कि यह पत्रकारों की आवाज दबाने की कोशिश है और अगर यही रवैया रहा तो पत्रकार मैदान में उतरेंगे।

पर इस पूरे घटनाक्रम का सबसे पोल यही है कि भोपाल की पत्रकारिता बिरादरी, जो खुद को “पत्रकारिता के पठाधीश” मानती है, वह सत्ता के इस तमाशे में चुपचाप दर्शक बनकर बैठी रही। किसी ने विरोध में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस तक करने की ज़हमत नहीं उठाई। मानो सत्ता ने दो लोगों को नहीं, एक विचार को, एक परंपरा को, एक हिम्मत को गिरफ्तार किया हो — और बाकी सब तालियां बजा रहे हों।

पत्रकारिता की आज जो स्थिति है, वह एक पुराने शेर की तरह लगती है —

“जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है,

आपके पीछे तेज हवा है आगे मुकद्दर आपका है,

उस के कत्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया,

मेरे कत्ल पे आप भी चुप हैं अगला नम्बर आपका है।”

आज आनंद पांडे और हरिश दिवेकर हैं,

कल शायद वो होंगे जो आज ‘चुप’ हैं।

और जब आपके दरवाजे पर सत्ता की हथकड़ियों की खनक गूंजेगी, तब यह चुप्पी किसी काम नहीं आएगी।

यह गिरफ्तारी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं — यह एक संदेश है।

संदेश यह कि जो सत्ता से सवाल करेगा, वह या तो झुकेगा… या जेल जाएगा।

और जो बाकी हैं, वे खामोश रहकर इस ‘लोकतांत्रिक तमाशे’ का टिकट कटाकर फ्रंट सीट पर बैठ जाएंगे।

पत्रकार पोपटलाल कहिन 



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