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लोकतंत्र में विधायक की भाषा का गिरता स्तर और खाकी का संयम..............

  लोकतंत्र में विधायक  की भाषा का गिरता स्तर और खाकी का संयम................. प्रसंगवश / बेचैन नजर  लोकतंत्र के मंदिर में बैठकर जनसेवा की शप...

 लोकतंत्र में विधायक  की भाषा का गिरता स्तर और खाकी का संयम.................

प्रसंगवश / बेचैन नजर 


लोकतंत्र के मंदिर में बैठकर जनसेवा की शपथ लेने वाले जनप्रतिनिधि जब अहंकार की भाषा बोलने लगें तो वह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं का चीरहरण होता है। शिवपुरी के पिछोर विधायक प्रीतम लोधी द्वारा एक ऑन-ड्यूटी आईपीएस अधिकारी के विरुद्ध जिस प्रकार की अमर्यादित शब्दावली का प्रयोग किया गया उसने राजनीति के गिरते स्तर को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। करैरा तेरे डैडी का नहीं है या औकात में रहो जैसे जुमले न केवल असंसदीय हैं बल्कि उस पद की गरिमा को भी धूल-धूसरित करते हैं जिसका प्रतिनिधित्व लोधी स्वयं करते हैं।

सत्ता की हनक अक्सर यह भुला देती है कि कानून की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी रसूख और साधारण नागरिक के बीच भेद नहीं करती। यदि एक विधायक का पुत्र सड़क पर दुर्घटना करता है तो पुलिस का कर्तव्य उससे पूछताछ करना और वाहन के अवैध साजो-सामान (काली फिल्म और हूटर) पर कार्रवाई करना है। इसे प्रताड़ना की संज्ञा देना हास्यास्पद भी है और खतरनाक भी। पुलिस अधिकारी अपनी ड्यूटी कर रहे थे और यदि उनकी कार्यशैली से विधायक को आपत्ति थी तो उसके लिए शिकायत के वैधानिक मंच उपलब्ध थे। सड़कछाप भाषा में वीडियो जारी कर धमकी देना किसी भी दृष्टि से एक विधायक ' को शोभा नहीं देता।

हैरत की बात यह है कि जिस अधिकारी को विधायक औकात दिखाने की बात कर रहे हैं, उसी अधिकारी की निष्पक्षता पर जनता सोशल मीडिया के जरिए अपनी मुहर लगा रही है। यह जनता का अपने रक्षकों के प्रति विश्वास ही है कि लोग खुलकर खाकी के समर्थन में खड़े हैं। जब रक्षक ही भक्षक की भाषा बोलने लगें तो समाज का विश्वास डगमगाने लगता है। प्रीतम लोधी को यह समझना होगा कि जनता ने उन्हें कानून बनाने के लिए सदन में भेजा है कानून को अपने हाथ में लेने या उसे डराने के लिए नहीं।

भाजपा जैसे अनुशासित दल के लिए भी यह आत्ममंथन का विषय है। बदजुबानी करने वाले ऐसे चेहरों को यह कड़ा संदेश देना जरूरी है कि सरकार संविधान से चलती है व्यक्तिगत धौंस से नहीं…. पुलिस का मनोबल गिरना समाज में अराजकता को निमंत्रण देना है। यदि वर्दीधारी अधिकारियों को इस तरह सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाएगा, तो वे रसूखदारों के विरुद्ध कार्रवाई करने से कतराने लगेंगे। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति में मर्यादा शब्द को शब्दकोश से निकालकर आचरण में उतारा जाए। अधिकार और अहंकार के बीच की इस पतली रेखा को समझना ही एक सच्चे जनसेवक की पहली पहचान है।

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