परिवहन विभाग में ‘₹200 की रसीद’ से करोड़ों का खेल? टेंडर रद्द… फिर भी दो साल से वसूली जारी! आखिर किसके संरक्षण में चल रहा यह खेल? Indiaaaj...
परिवहन विभाग में ‘₹200 की रसीद’ से करोड़ों का खेल?
टेंडर रद्द… फिर भी दो साल से वसूली जारी! आखिर किसके संरक्षण में चल रहा यह खेल?
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Editor-in-Chief : Vinod Vikat
Mob : 09977708976
Date : 29/05/2026
भोपाल / मध्यप्रदेश का परिवहन विभाग अब सवालों के घेरे में है। आरोप यह है कि ड्राइविंग लाइसेंस धारकों से “हार्ड कॉपी” और “रसीद शुल्क” के नाम पर ₹200 तक की वसूली लगातार की जा रही है, जबकि संबंधित टेंडर वर्षों पहले निरस्त हो चुका बताया जा रहा है। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर टेंडर खत्म हो चुका था, तो आखिर जनता से यह पैसा किस आदेश पर लिया जा रहा था?
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे पोस्टर और दस्तावेज़ों ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह, मुख्यमंत्री Mohan Yadav और परिवहन आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
“टेंडर रद्द… फिर भी वसूली चालू!”
सूत्रों के अनुसार विभाग में लाइसेंस की हार्ड कॉपी उपलब्ध कराने के नाम पर वर्षों से ₹200 की रसीद काटी जा रही थी। बताया जा रहा है कि संबंधित व्यवस्था का टेंडर पहले ही निरस्त हो चुका था, इसके बावजूद शुल्क लेना बंद नहीं हुआ।
अब सवाल उठ रहा है कि:
क्या जनता को गुमराह किया गया?
क्या करोड़ों रुपये की अवैध वसूली हुई?
क्या विभागीय अधिकारियों और निजी एजेंसियों की मिलीभगत से यह खेल चलता रहा?
क्या सरकार को इसकी जानकारी थी या सब कुछ “ऊपर तक सेटिंग” में चल रहा था?
जनता पूछ रही — “जब सुविधा ही नहीं, तो शुल्क किस बात का?”
प्रदेश भर के लाखों लाइसेंस धारकों से वसूले गए इस कथित शुल्क को लेकर लोगों में भारी आक्रोश है। सोशल मीडिया पर लोग इसे “MP का सबसे बड़ा लाइसेंस घोटाला” बता रहे हैं।
सरकारी निविदाओं और शुल्क प्रक्रियाओं के नियम स्पष्ट पारदर्शिता की मांग करते हैं। विभिन्न सरकारी पोर्टलों पर निविदा और शुल्क संबंधी प्रक्रियाएं सार्वजनिक रूप से प्रकाशित की जाती हैं। �
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विपक्ष हमलावर, लेकिन सरकार मौन!
प्रदेश में भ्रष्टाचार के मुद्दों पर लगातार बयान देने वाली सरकार अब खुद कटघरे में दिखाई दे रही है। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि परिवहन विभाग “वसूली केंद्र” बन चुका है और आम आदमी को लूटने का काम किया जा रहा है।
अगर यह पूरा मामला सही साबित होता है, तो यह सिर्फ विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि करोड़ों रुपये के संगठित आर्थिक खेल का मामला बन सकता है।
सबसे बड़ा सवाल:
क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराएंगे?
क्या परिवहन मंत्री जवाब देंगे?
क्या जनता से वसूले गए करोड़ों रुपये वापस होंगे?
और सबसे अहम — दोषियों पर कार्रवाई होगी या फाइलें दबा दी जाएंगी?
प्रदेश की जनता अब जवाब चाहती है… क्योंकि यह मामला सिर्फ ₹200 का नहीं, बल्कि सिस्टम में बैठे भ्रष्टाचार की जड़ों का बताया जा रहा है।

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