एसी कमरों में सोता प्रशासन, पक्षियों की प्यास बुझाने मैदान में उतरा एक अफसर! शिवपुरी में इंसानियत जिंदा है… क्योंकि अभी भी कुछ अफसर संवेदन...
एसी कमरों में सोता प्रशासन, पक्षियों की प्यास बुझाने मैदान में उतरा एक अफसर!
शिवपुरी में इंसानियत जिंदा है… क्योंकि अभी भी कुछ अफसर संवेदनाओं से काम करते हैं, सिर्फ कुर्सियों से नहीं।
Indiaaajtak.in
Editor-in-Chief : Vinod Vikat
Mob : 09977708976
Date : 29/05/2026
शिवपुरी / शिवपुरी जिले में भीषण गर्मी ने इंसानों से लेकर बेजुबान पक्षियों तक का जीना मुश्किल कर दिया है। तापमान आसमान छू रहा है, तालाब सूख रहे हैं, पेड़ों पर बैठे पक्षी प्यास से तड़प रहे हैं… लेकिन जिले के अधिकांश प्रशासनिक अधिकारी एसी कमरों में बैठकर सिर्फ बैठकें और कागजी योजनाएं बना रहे हैं।
ऐसे माहौल में पोहरी जनपद पंचायत के CEO आफिसर सिंह गुर्जर ने वह काम कर दिखाया, जो पूरे जिले के प्रशासन के लिए आईना बन गया है।
उन्होंने खुद मैदान में उतरकर पक्षियों के लिए दाना-पानी अभियान शुरू कराया, पेड़ों पर सकोरे टंगवाए और ग्रामीणों को भी इस नेक कार्य से जोड़ा।
एक अफसर जागा… पूरा सिस्टम सोता रहा!
जब पूरा प्रशासन गर्मी से बचने के लिए दफ्तरों के एसी में आराम कर रहा है, तब एक अधिकारी खुले मैदान में बेजुबान पक्षियों की प्यास बुझाने में जुटा दिखाई दिया। यह तस्वीर केवल एक अभियान नहीं, बल्कि उन अधिकारियों के मुंह पर तमाचा है जो जनता और प्रकृति दोनों की पीड़ा से बेखबर बने बैठे हैं।
बड़ा सवाल — क्या बाकी अफसरों की संवेदनाएं मर चुकी हैं?
क्या जिले के अन्य अधिकारी पक्षियों की हालत नहीं देख रहे?
क्या नगर पालिका और पंचायतों की जिम्मेदारी सिर्फ फाइलों तक सीमित है?
क्या करोड़ों के बजट के बीच पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था भी नहीं हो सकती?
क्या प्रशासन सिर्फ वीआईपी कार्यक्रमों और फोटो सेशन तक सीमित रह गया है?
जनता बोली — “ऐसे अफसरों की जरूरत है”
पोहरी क्षेत्र में शुरू हुए इस अभियान की ग्रामीणों ने जमकर सराहना की। लोगों का कहना है कि अगर जिले के सभी अधिकारी इसी तरह संवेदनशील होकर काम करें तो शिवपुरी की तस्वीर बदल सकती है।
इंडिया आज तक का सवाल
जब एक अधिकारी अकेले पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था कर सकता है, तो पूरा जिला प्रशासन क्यों नहीं?
क्या बाकी अधिकारी सिर्फ आदेश जारी करेंगे या मैदान में उतरकर जिम्मेदारी भी निभाएंगे?
आज जरूरत भाषणों की नहीं… इंसानियत की है।

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