56 दिनों का प्रशासनिक 'एक्शन मॉडल': निरीक्षण, कार्रवाई और जनसरोकारों से शिवपुरी में उभरी नई कार्यसंस्कृति संपादकीय शिवपुरी जिले मे...
56 दिनों का प्रशासनिक 'एक्शन मॉडल': निरीक्षण, कार्रवाई और जनसरोकारों से शिवपुरी में उभरी नई कार्यसंस्कृति
संपादकीय
शिवपुरी जिले में 13 अप्रैल 2026 को पदभार ग्रहण करने वाले कलेक्टर अर्पित वर्मा को आज 56 दिन पूरे हो चुके हैं। प्रशासनिक दृष्टि से यह अवधि भले ही बहुत लंबी न मानी जाए, लेकिन इतने कम समय में जिस प्रकार की सक्रियता, जवाबदेही और जमीनी उपस्थिति प्रशासनिक तंत्र में दिखाई दी है, उसने जिले में एक नई कार्यसंस्कृति की शुरुआत का संकेत दिया है।
पदभार संभालने के बाद अपनी पहली प्रेस वार्ता में कलेक्टर अर्पित वर्मा ने कहा था कि "मुझ पर राजनीतिक दबाव नहीं चलता।" यह बयान केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बीते 56 दिनों में उनके कामकाज के तौर-तरीकों में भी इसकी झलक दिखाई दी। जिले की प्रशासनिक मशीनरी, जो लंबे समय से सुस्ती, लापरवाही, भ्रष्टाचार और योजनाओं के कमजोर क्रियान्वयन को लेकर सवालों के घेरे में रही है, उसे गति देने का प्रयास स्पष्ट रूप से नजर आया।
शिवपुरी जैसे बड़े जिले में वर्षों से जनता की सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि अधिकारी कार्यालयों में बैठकर योजनाओं की समीक्षा तो करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत से उनका सीधा संपर्क नहीं होता। कलेक्टर अर्पित वर्मा ने इस परंपरा को तोड़ते हुए स्वयं मैदान में उतरकर निरीक्षणों का सिलसिला शुरू किया। जिला अस्पताल से लेकर स्कूलों तक, तहसीलों से लेकर एसडीएम कार्यालयों तक, उन्होंने व्यवस्थाओं की पड़ताल की और अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया कि अब केवल कागजी प्रगति पर्याप्त नहीं होगी।
उनकी सक्रियता का प्रभाव यह रहा कि स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, शिक्षा विभाग और अन्य कई विभागों के अधिकारी भी फील्ड में उतरने को मजबूर हुए। निरीक्षणों की संस्कृति, जो कई स्थानों पर केवल औपचारिकता बनकर रह गई थी, वह फिर से प्रशासनिक प्राथमिकता बनती दिखाई दी।
खनिज विभाग में हुई कार्रवाइयों ने भी जिले में एक मजबूत संदेश दिया। खनिज निरीक्षक सोनू श्रीवास को हटाने की कार्रवाई हो या फिर चार खदानों के पट्टों का निरस्तीकरण, इन फैसलों ने यह संकेत दिया कि प्रशासन शिकायतों को केवल सुनने तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि आवश्यक होने पर कठोर निर्णय लेने से भी पीछे नहीं हटेगा।
कलेक्टर अर्पित वर्मा की कार्यशैली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उन्होंने प्रशासन को जिला मुख्यालय की सीमाओं से बाहर निकालने का प्रयास किया। कोलारस विधानसभा क्षेत्र के गोरा टीला गांव में संभाग आयुक्त मनोज खत्री और जिले के विभिन्न विभागों के अधिकारियों के साथ ग्रामीणों के बीच रात्रि विश्राम कर समस्याएं सुनना और उनके समाधान की दिशा में प्रयास करना सामान्य प्रशासनिक गतिविधि नहीं कही जा सकती। यह उस सोच का परिचायक है जिसमें शासन को जनता के दरवाजे तक पहुंचाने की मंशा दिखाई देती है।
ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत में जनसुनवाई आयोजित करने के निर्देश भी इसी सोच का विस्तार हैं। यदि यह व्यवस्था पूरी गंभीरता से लागू होती है तो आम नागरिकों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए जिला मुख्यालय के चक्कर लगाने से राहत मिलेगी। यह कदम प्रशासन और जनता के बीच की दूरी कम करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
शिवपुरी शहर के जल संकट के दौरान कलेक्टर की कार्यशैली एक बार फिर चर्चा में रही। जब केंद्रीय मंत्री एवं सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित भाजपा के अनेक नेताओं ने शहर में पेयजल संकट को लेकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया, तब अगले ही दिन वार्ड क्रमांक 1 से 39 तक सभी जिला अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपकर जल वितरण व्यवस्था को व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया। संकट की घड़ी में विभागीय समन्वय स्थापित कर राहत पहुंचाने का यह मॉडल प्रशासनिक प्रबंधन का एक सकारात्मक उदाहरण माना जा सकता है।
सीएम हेल्पलाइन की लगातार समीक्षा, विभागवार प्रगति की निगरानी, अधिकारियों की जवाबदेही तय करना, कोर्ट रोड पर यातायात सुधार और आदर्श सड़क की परिकल्पना जैसे विषय यह दर्शाते हैं कि वर्तमान प्रशासन केवल तात्कालिक समस्याओं के समाधान तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि व्यवस्थागत सुधार की दिशा में भी काम कर रहा है।
हालांकि किसी भी प्रशासनिक अधिकारी का मूल्यांकन केवल प्रशंसा के आधार पर नहीं किया जा सकता। हाल ही में भाजपा के एक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की मौजूदगी के दौरान कलेक्टर अर्पित वर्मा की उपस्थिति को लेकर विपक्षी विधायक कैलाश कुशवाह ने सवाल खड़े किए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की यह जिम्मेदारी भी है कि वह प्रशासन की निष्पक्षता पर नजर रखे और आवश्यक प्रश्न उठाए। वहीं प्रशासन के लिए भी यह आवश्यक है कि उसकी कार्यशैली इतनी पारदर्शी और संतुलित हो कि निष्पक्षता पर किसी प्रकार का संदेह न रहे।
वास्तविकता यह है कि शिवपुरी की समस्याएं दशकों पुरानी हैं। भ्रष्टाचार, अधूरी योजनाएं, अव्यवस्थित व्यवस्थाएं, कमजोर निगरानी तंत्र और जनता की शिकायतों का समय पर निराकरण न होना ऐसे मुद्दे हैं जिनका समाधान 56 दिनों में संभव नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी जिले में बदलाव की शुरुआत प्रशासनिक इच्छाशक्ति से ही होती है। यदि शीर्ष स्तर पर सक्रियता दिखाई देती है तो उसका प्रभाव नीचे तक पहुंचता है।
आज जब कलेक्टर अर्पित वर्मा के कार्यकाल के 56 दिन पूरे हो रहे हैं, तब यह कहा जा सकता है कि उन्होंने जिले में प्रशासनिक सक्रियता का एक नया मॉडल प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। निरीक्षण, जवाबदेही, जनसुनवाई, त्वरित कार्रवाई और जनता से सीधे संवाद की जो कार्यसंस्कृति विकसित होती दिखाई दे रही है, वह आने वाले समय में और मजबूत होती है या नहीं, यही उनकी सफलता का वास्तविक पैमाना होगा।
फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है कि शिवपुरी में प्रशासन केवल फाइलों तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि सड़कों, गांवों, अस्पतालों, स्कूलों और जनता की समस्याओं के बीच दिखाई देने लगा है। किसी भी जिले के लिए यह बदलाव अपने आप में एक सकारात्मक संकेत माना जाएगा।
— संपादकीय विभाग, Indiaaajtak.in

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