मेडिकल कॉलेज में 'खून' का अकाल, सड़कों पर 'आरटीओ' का मायाजाल; आखिर कितनी और बलि माँगेगा यह भ्रष्ट तंत्र? शिवपुरी। शिवपुरी ...
मेडिकल कॉलेज में 'खून' का अकाल, सड़कों पर 'आरटीओ' का मायाजाल; आखिर कितनी और बलि माँगेगा यह भ्रष्ट तंत्र?
शिवपुरी। शिवपुरी में प्रशासन नाम की संस्था अब केवल सफेद हाथी बनकर रह गई है। यहाँ की हवाओं में अब विकास की गूँज नहीं, बल्कि सिस्टम के हाथों मारे गए लोगों के परिजनों का विलाप गूँज रहा है। मेडिकल कॉलेज से लेकर सड़कों तक, हर जगह लापरवाही का नग्न नाच चल रहा है।
खून के प्यासे अस्पताल: जहाँ इलाज नहीं, 'इंतजार' मार देता है
मेडिकल कॉलेज में 3 साल की बच्ची की मौत कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक हत्या है।
सफेद झूठ का नकाब: करोड़ों की लागत से बना मेडिकल कॉलेज क्या एक बच्ची को चंद यूनिट खून नहीं दे पाया? यह मौत खून की कमी से नहीं, बल्कि प्रबंधन की 'मानसिक दरिद्रता' से हुई है।
निजी स्वार्थ की 'शिखा': सुखदेव हॉस्पिटल में महिला की मौत ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस और मुनाफे के चक्कर में किस कदर अंधे हो चुके हैं। डॉ. शिखा जैन जैसे नाम जब विवादों में आते हैं, तो सवाल उठता है कि क्या प्रशासन ने इन रसूखदार
डॉक्टरों को 'लापरवाही का लाइसेंस' दे रखा है?
परिवहन विभाग: भ्रष्टाचार का 'ट्रिपल इंजन' और सड़कों पर बिछती लाशें
शिवपुरी आरटीओ (RTO) कार्यालय आज भ्रष्टाचार और अव्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।
एक साहब, तीन जिले: आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि यहाँ के आरटीओ को तीन-तीन जिलों का प्रभार देकर 'सुपरमैन' बना दिया गया है? क्या मध्य प्रदेश में काबिल अफसरों का अकाल पड़ गया है या फिर इस मलाईदार कुर्सी का मोह उन्हें यहाँ से हिलने नहीं दे रहा?
कंडम बसों का तांडव: जब आरटीओ साहब तीन जिलों की फाइलें निपटाने (या बनाने) में व्यस्त रहते हैं, तब सड़कों पर यमराज बनकर बसें दौड़ती हैं। बस में हुई बच्चे की मौत का जिम्मेदार वह ड्राइवर नहीं, बल्कि वह सिस्टम है जिसने बिना फिटनेस जाँचे इन खटारा बसों को सड़क पर उतरने की अनुमति दी।
आंकड़ों की बाजीगरी और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा
कलेक्टर से लेकर निचले स्तर के अधिकारी तक, शिवपुरी का पूरा प्रशासनिक अमला केवल 'डेटा मैनेजमेंट' में लगा है।
मंत्री जी आएँगे तो चकाचक सड़कें दिखाई जाएँगी।
रिपोर्ट्स में शिशुओं की मृत्यु दर कम बताई जाएगी।
लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि गरीब आदमी आज भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते दम तोड़ रहा है।
सवाल सीधा है: क्या आरटीओ कार्यालय का 'मैनेजमेंट' ऊपर तक पहुँचता है, इसलिए उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती? क्या मेडिकल कॉलेज के डीन और स्वास्थ्य विभाग के आला अफसर सिर्फ वेतन लेने के लिए कुर्सियों पर बैठे हैं...?

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