मौत बनकर दौड़ रहीं बसें! शिवपुरी से भोपाल तक परिवहन विभाग पर उठे बड़े सवाल, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल? Indiaaajtak.com Editor-in-C...
मौत बनकर दौड़ रहीं बसें!
शिवपुरी से भोपाल तक परिवहन विभाग पर उठे बड़े सवाल, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल?
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Editor-in-Chief: Vinod Vikat
Mob: 9977708976
Date: 28/05/2026
शिवपुरी। मध्य प्रदेश में लगातार हो रहे बस हादसों ने पूरे परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। गुना में 13 लोगों की जिंदा जलकर मौत, शिवपुरी में स्कूली बस में आग और शाजापुर में मासूम बच्चे की दर्दनाक मौत के बाद अब जनता पूछ रही है कि आखिर सड़क पर दौड़ रही इन बसों की जिम्मेदारी किसकी है?
प्रदेशभर में अनफिट, जर्जर और संदिग्ध हालत वाली बसें खुलेआम यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रही हैं। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि आखिर परिवहन विभाग की चेकिंग और फिटनेस व्यवस्था जमीन पर दिखाई क्यों नहीं देती? क्या हादसों के बाद केवल कार्रवाई का दिखावा किया जाता है?
शिवपुरी जिले में परिवहन विभाग की कार्यशैली को लेकर लगातार चर्चाएं तेज हो रही हैं। जिला परिवहन अधिकारी श्रीमती रंजना कुशवाहा की कार्यप्रणाली पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों और यात्रियों का कहना है कि जिले में कई निजी बसें नियमों की अनदेखी करते हुए सड़कों पर दौड़ रही हैं, लेकिन उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती।
जनता के बीच यह चर्चा भी तेज है कि आखिर लगातार शिकायतों और हादसों के बावजूद जिला प्रशासन की ओर से कठोर मॉनिटरिंग क्यों नहीं हो रही। लोगों की नजर अब शिवपुरी कलेक्टर अर्पित वर्मा की भूमिका पर भी टिक गई है। नागरिकों का कहना है कि यदि जिला प्रशासन नियमित रूप से परिवहन व्यवस्था की समीक्षा करे और जवाबदेही तय करे, तो हालात में सुधार संभव है।
सूत्रों के अनुसार, जिले में लंबे समय से परिवहन व्यवस्था को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाई जाती हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब क्यों नहीं मांगा जा रहा?
प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो चुकी है कि यदि समय रहते कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो कभी भी कोई बड़ा हादसा पूरे सिस्टम को हिला सकता है। जनता मांग कर रही है कि पूरे प्रदेश में विशेष अभियान चलाकर सभी निजी बसों की फिटनेस, फायर सेफ्टी, वायरिंग और परमिट की जांच कराई जाए।
लोगों का कहना है कि यदि गुना हादसे के बाद वास्तव में सख्त सुधार हुए होते, तो शायद शाजापुर में मासूम की जान नहीं जाती। सवाल अब सीधे सिस्टम पर है — क्या परिवहन विभाग सिर्फ हादसों के बाद प्रेस नोट जारी करने तक सीमित रह गया है? क्या जिम्मेदारी केवल छोटे कर्मचारियों तक तय होगी? और क्या जनता की जान की कीमत सिर्फ मुआवजे तक रह गई है?
अब पूरे प्रदेश की नजर मुख्यमंत्री, परिवहन मंत्री और जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है। यदि अब भी सख्ती नहीं हुई, तो जनता का आक्रोश कभी भी बड़ा रूप ले सकता है।


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