शिवपुरी में आवारा कुत्तों का आतंक: 65 से ज्यादा लोग घायल, दावों में उलझे अफसर, जवाबदेही से बचता प्रशासन शिवपुरी। रिपोर्ट: विनोद विकट Edito...
शिवपुरी में आवारा कुत्तों का आतंक: 65 से ज्यादा लोग घायल, दावों में उलझे अफसर, जवाबदेही से बचता प्रशासन
शिवपुरी। रिपोर्ट: विनोद विकट Editor-in-Chief, Indiaaajtak.in मो. 09977708976 दिनांक: 01 जून 2026
शिवपुरी शहर में आवारा कुत्तों का आतंक अब प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा उदाहरण बन चुका है। बीते दो दिनों में 65 से अधिक लोग कुत्तों के हमलों का शिकार हुए हैं। इनमें दो वर्षीय मासूम वैदिका जादौन, रितेश जादौन, वर्षिका जादौन, संजू आदिवासी, प्रवीण जाटव, अंशिक खान सहित कई नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इसके बावजूद नगर पालिका, पशुपालन विभाग और जिला प्रशासन के दावों तथा जमीनी हकीकत में भारी अंतर दिखाई दे रहा है।
31 मई को नगर पालिका ने जिस कुत्ते को पकड़ने का दावा किया, उसी रंग और हुलिए के कुत्ते द्वारा अगले ही दिन शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों को घायल किए जाने की खबरें सामने आईं। इससे नगर पालिका की कार्रवाई और दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
शहर के नवाब साहब रोड, सर्किट हाउस रोड, शक्तिपुरम, राजेश्वरी रोड, कमलेश्वर कॉलोनी, गुना बायपास और अन्य क्षेत्रों में लगातार हमले हो रहे हैं। अस्पतालों में घायलों की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन जिम्मेदार विभाग अभी तक स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि आखिर वास्तविक हमलावर कुत्ते कौन हैं और उन्हें नियंत्रित करने की ठोस योजना क्या है।
नगर पालिका लाखों रुपये खर्च कर नसबंदी अभियान चलाने का दावा कर रही है, जबकि पशुपालन विभाग कई मामलों में अपनी भूमिका सीमित बताकर जिम्मेदारी से दूरी बनाता दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर जिला प्रशासन की ओर से भी अब तक कोई ऐसी प्रभावी रणनीति सामने नहीं आई है, जिससे नागरिकों को तत्काल राहत मिल सके।
शहरवासियों का आरोप है कि जब तक कोई बड़ी और दुखद घटना नहीं हो जाती, तब तक प्रशासनिक मशीनरी सिर्फ बयानबाजी और कागजी कार्रवाई तक सीमित रहती है। हालात यह हैं कि लोग सुबह की सैर, बच्चों के स्कूल जाने और बाजारों में निकलने से भी डरने लगे हैं।
जवाबदेही तय हो
जब दो दिनों में 65 से अधिक लोग घायल हो सकते हैं, मासूम बच्चे अस्पताल पहुंच सकते हैं और हमले लगातार जारी रह सकते हैं, तो यह केवल आवारा कुत्तों की समस्या नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता का मामला भी है। ऐसे में जिला कलेक्टर, नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित पशुपालन विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी शहर में आवारा कुत्तों का आतंक क्यों कायम है?
जिस कुत्ते को पकड़ने का दावा किया गया, उसके बाद भी हमले कैसे जारी रहे?
नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
बढ़ती घटनाओं के बावजूद अब तक प्रभावी नियंत्रण योजना क्यों नहीं बन सकी?
जनता का दर्द अब आंकड़ा नहीं, प्रशासन की परीक्षा बन चुका है। यदि जिम्मेदार अधिकारी अब भी नहीं चेते, तो यह लापरवाही किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।

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