संपादकीय क्या 39 अधिकारियों की तैनाती प्रशासन की सफलता है या जल व्यवस्था की विफलता? शिवपुरी शहर आज जिस जल संकट से गुजर रहा है, वह केवल एक तक...
संपादकीय
क्या 39 अधिकारियों की तैनाती प्रशासन की सफलता है या जल व्यवस्था की विफलता?
शिवपुरी शहर आज जिस जल संकट से गुजर रहा है, वह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा भी है। मड़ीखेड़ा पंपिंग स्टेशन की मोटर खराब होने के बाद जिस तरह पूरे शहर में पेयजल संकट गहराया, उसने नगर की जल आपूर्ति व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है।
कलेक्टर अर्पित वर्मा द्वारा अपर कलेक्टर दिनेश चन्द्र शुक्ला को नोडल अधिकारी नियुक्त कर वार्डवार अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना एक आवश्यक कदम है। संयुक्त कलेक्टर जे.पी. गुप्ता, एसडीएम आनंद सिंह राजावत, डिप्टी कलेक्टर शिवदयाल धाकड़, मोतीलाल अहिरवार, अजय शर्मा, डीपीएम अरविन्द्र भार्गव, डी.एस. जादौन, महेश श्रीवास्तव, शुभम अग्रवाल, गौरव गुप्ता, मोहित जैन, जी.के. श्रीवास्तव, जे.पी. गनोटे, राम सिंह उइके, इशांक धाकड़, पी.एस. करोरिया, तुलेश्वर कुर्रे, सचिन चौहान, दफेदार सिंह सिकरवार, सिद्धार्थ भूषण शर्मा और अनिल धाकड़ सहित अनेक अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
लेकिन यहां एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। यदि शहर में पानी की व्यवस्था पहले से सुचारु थी, तो अचानक 39 वार्डों की निगरानी के लिए इतने बड़े प्रशासनिक अमले की आवश्यकता क्यों पड़ गई? और यदि आवश्यकता पड़ गई है, तो क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं है कि मौजूदा व्यवस्था कहीं न कहीं कमजोर साबित हुई है?
जनता की नजर में समस्या का समाधान आदेशों की संख्या से नहीं, बल्कि नलों में आने वाले पानी से तय होगा। आम नागरिक को इस बात से कोई मतलब नहीं कि किस वार्ड में कौन अधिकारी तैनात है। उसे केवल इतना चाहिए कि उसके घर तक नियमित और पर्याप्त पानी पहुंचे। जब लोग टैंकरों के पीछे दौड़ने को मजबूर हों, तब बैठकों, निरीक्षणों और आदेशों की सफलता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक जिम्मेदारी उन विभागों की बनती है जो वर्षों से जल आपूर्ति व्यवस्था संभाल रहे हैं। संकट आने के बाद निगरानी बढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि संकट आने ही क्यों दिया गया? क्या वैकल्पिक व्यवस्थाएं पहले से तैयार थीं? क्या तकनीकी खराबी की स्थिति में आपातकालीन योजना मौजूद थी? यदि थी तो उसका प्रभाव दिखाई क्यों नहीं दिया?
यह भी आवश्यक है कि जिन अधिकारियों को वार्डों की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उनकी जवाबदेही भी तय हो। जनता को यह जानने का अधिकार है कि किस क्षेत्र में क्या सुधार हुआ, कितनी शिकायतें आईं और उनका निराकरण कितनी तेजी से हुआ।
शिवपुरी की जनता प्रशासन से चमत्कार नहीं मांग रही। वह केवल अपनी मूलभूत आवश्यकता—पेयजल—की मांग कर रही है। इसलिए यह समय केवल जिम्मेदारियां बांटने का नहीं, बल्कि परिणाम देने का है।
यदि आने वाले दिनों में शहर की जल व्यवस्था पटरी पर लौटती है तो यह प्रशासन की उपलब्धि होगी। लेकिन यदि तमाम अधिकारियों की तैनाती के बावजूद हालात नहीं सुधरे, तो यह सवाल हमेशा पूछा जाएगा कि आखिर इतनी बड़ी प्रशासनिक फौज होने के बावजूद जनता प्यास क्यों झेलती रही?
लोकतंत्र में किसी भी व्यवस्था का अंतिम मूल्यांकन जनता करती है, और जनता के लिए सबसे बड़ा पैमाना यही है—क्या उसके घर के नल में पानी आया या नहीं?

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