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खनिज विभाग में कार्रवाई, जल संकट में खामोशी क्यों? ए.ई. सचिन चौहान पर कब चलेगा प्रशासन का डंडा?

  Indiaaajtak.in Editor-in-Chief: Vinod Vikat Mob.: 09977708976 दिनांक: 30 मई 2026 खनिज विभाग में कार्रवाई, जल संकट में खामोशी क्यों? ए.ई. स...

 Indiaaajtak.in

Editor-in-Chief: Vinod Vikat

Mob.: 09977708976

दिनांक: 30 मई 2026

खनिज विभाग में कार्रवाई, जल संकट में खामोशी क्यों? ए.ई. सचिन चौहान पर कब चलेगा प्रशासन का डंडा?

कलेक्टर ने खनिज विभाग में दिखाई सख्ती, अब नगर पालिका की जल व्यवस्था पर उठ रहे सवाल


शिवपुरी। शिवपुरी कलेक्टर अर्पित वर्मा द्वारा हाल ही में खनिज विभाग में लंबे समय से पदस्थ खनिज निरीक्षक सरवर सोनू श्रीवास को हटाकर कृषि विभाग में भेजे जाने की कार्रवाई को प्रशासनिक सख्ती के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इसी के साथ शहर में एक नया सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब विभिन्न विभागों में लंबे समय से जमे अधिकारियों पर कार्रवाई हो सकती है, तो नगर पालिका की जल व्यवस्था की जिम्मेदारी वर्षों से संभाल रहे अधिकारियों की जवाबदेही कब तय होगी?

शहर इस समय गंभीर जल संकट से गुजर रहा है। मड़ीखेड़ा जल आवर्धन योजना और जल प्रदाय व्यवस्था पर वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद नागरिकों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में नगर पालिका में जल व्यवस्था और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी संभाल रहे ए.ई. सचिन चौहान को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

जनचर्चा का विषय यह है कि पिछले कई वर्षों में नगर पालिका में सीएमओ बदले, अध्यक्ष बदले, कलेक्टर बदले और कई प्रशासनिक फेरबदल हुए, लेकिन जल व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे अधिकारी की भूमिका पर कभी गंभीर समीक्षा सामने नहीं आई। दूसरी ओर हर साल गर्मी आते ही शहर में पेयजल संकट गहराता चला जाता है।

शहरवासियों का कहना है कि यदि खनिज विभाग में लंबे समय से पदस्थ अधिकारी को प्रशासनिक कारणों से बदला जा सकता है, तो फिर जल संकट से सीधे जुड़े विभाग में भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। आखिर करोड़ों रुपये की योजनाओं और मेंटेनेंस कार्यों के बावजूद यदि जनता पानी के लिए परेशान है, तो इसके कारणों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

हालांकि वर्तमान में कलेक्टर अर्पित वर्मा द्वारा वैकल्पिक जल व्यवस्था के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं और टैंकरों सहित अन्य संसाधनों के माध्यम से नागरिकों को राहत देने की कोशिश की जा रही है। लेकिन आम नागरिकों का कहना है कि अस्थायी व्यवस्थाओं के साथ-साथ उन कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिए जिनकी वजह से स्थायी जल आपूर्ति व्यवस्था बार-बार सवालों के घेरे में आती रही है।

अब शहर में यह सवाल गूंज रहा है कि खनिज विभाग में कार्रवाई संभव है तो जल संकट से जुड़े मामलों में जवाबदेही तय करने से प्रशासन क्यों पीछे है? क्या नगर पालिका की जल प्रदाय व्यवस्था, मेंटेनेंस कार्यों और वर्षों में हुए खर्चों की समीक्षा होगी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी? और क्या जनता को यह जानने का अधिकार मिलेगा कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद पानी का संकट आखिर खत्म क्यों नहीं हो पा रहा?

शिवपुरी की प्यास अब केवल पानी की नहीं, जवाबदेही की भी है। प्रशासनिक गलियारों में यही चर्चा है कि यदि पारदर्शिता और जवाबदेही की नीति सभी विभागों पर समान रूप से लागू होती है, तो जल व्यवस्था से जुड़े सवालों के जवाब भी जनता के सामने आने चाहिए।

(नोट: उपरोक्त खबर में व्यक्त सवाल सार्वजनिक चर्चाओं और नागरिकों द्वारा उठाई जा रही मांगों पर आधारित हैं। किसी भी अधिकारी के विरुद्ध आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच एजेंसी द्वारा ही की जा सकती है।)

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